12 वर्ष पहले आज के ही दिन मेरे नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा हुई थी।
उस दिन मैं अपने ऑफिस में कंप्यूटर पर अलग अलग वेबसाइटों पर जर्मनी के लिए सबसे सस्ता टिकट ढूँढ रहा था।
तभी दिल्ली के एक पत्रकार का फ़ोन आया। वह ख़ुशी के मारे लगभग चीखते हुए बोले ,'कैलाश जी, नोबेल प्राइज, नाबेल प्राइज।' अति उत्साह और जल्दबाज़ी में वे यह नहीं बोल पाए कि प्राइस किसे मिला है।
मैंने सोचा कि जिस किसी के पुरस्कार की घोषणा हुई है, उनके बारे में वे मुझसे कोई बाईट चाहते हैं। मैंने उनका फ़ोन होल्ड करके गूगल पर वह नाम ढूँढना शुरू किया, ताकि ठीक से अपना बाईट दे सकूँ। लेकिन तब तक वहाँ कोई जानकारी नहीं आई थी।
कुछ ही क्षणों में ऑफिस के कई साथी ख़ुशी के मारे पागल हुए मुझसे आकर लिपट गए। तब मैंने जाना कि वह हादसा तो मेरे साथ हुआ है। हालांकि मुझे तब भी विश्वास नहीं हो रहा था।
आख़िर नोबेल शांति पुरस्कार के इतिहास में पहली बार दुनिया के सबसे शोषित और पीड़ित बच्चों को सम्मानित किया गया था, भले ही मेरे माध्यम से सही।
मैं आज भी अपने सभी साथियों ,सहयोगियों, अनगिनत बच्चों और उनके माता पिताओं के प्रति बेहद कृतज्ञ महसूस करता हूँ।
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