आज के लिए एक जरूरी कहानी।
बेहद गरीबी का शिकार एक आदमी बड़ी हिम्मत करके एक राजा से मिलने पहुंचता है, जो उसके बचपन का दोस्त था। दोनों ने साथ रहकर पढ़ाई-लिखाई की थी।
जाहिर है, सुरक्षाकर्मियों ने उसे भिखारी समझकर महल के दरवाजे पर ही रोक दिया। बड़ी मिन्नतों के बाद आखिर वे राजा तक संदेश पहुंचाने के लिए राजी हुए कि कोई जिद्दी पागल उन्हें अपना दोस्त बता कर बाहर खड़ा है।
खबर सुनकर राजा ने दरबानों से उस आदमी को अंदर ले आने के लिए नहीं कहा। वह तत्काल सिंहासन से उतरकर नंगे पैर महल से निकलकर बाहर दौड़ पड़ा। राजकर्मचारी हैरान थे।
राजा ने दरवाजे पर पहुंचकर उस फटेहाल दिख रहे आदमी को सीने से चिपटा लिया। और रोते हुए बस इतना ही कहा 'सुदामा, मेरे दोस्त!' राजा उसके गले में हाथ डाले हुए सीधे द्वारका के राजमहल के भीतर ले गया।
आज सुदामा के उसी दोस्त कृष्ण की #जन्माष्टमी पर आपको बधाई।
किसी को दोस्त कहना आसान है। लेकिन सत्ता, संपत्ति, ज्ञान और प्रसिद्धि के सिंहासनों से नीचे उतरकर नंगे पैर अपने गरीब दोस्त को साथ लेकर चलना कोई कृष्ण से सीखे। यही करुणा है।
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