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k_satyarthi
मै कॉमरेड रमाशंकर चौरसिया के अंतिम संस्कार के बाद मिर्ज़ापुर (उप्र) से लौट रहा हूँ। कल उनका देहांत हुआ था। वे लगभग 40 साल से हमारे आंदोलनों में मेरे सबसे विश्वसनीय साथी और व्यक्तिगत तौर पर बड़े भाई या पिता की तरह थे। वे 96 साल के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उन्हें तो जाना ही था, लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरे हाथों से कुछ फिसल गया है। दिल का कोई हिस्सा खाली हो गया है। बाल दासता के खिलाफ हमारे संघर्ष का सबसे जाज्वल्यमान सितारा टूट गया है। जो हाथ से फिसला, वह गर्व और गौरव से भरी एक गठरी थी, जिसमें सादगी, सरलता, विनम्रता, दृढ़ता, करुणा, संकल्प, समर्पण और समाज परिवर्तन की आग से भरे हुए एक जिंदा इंसान का उदाहरण था। तब मैं गर्व से कहता था कि ये आदर्श की बातें नहीं, मेरे साथी चौरसिया जी हैं। दिल का खाली हो गया हिस्सा, किसी आदमी के लिए आँख मूँद कर किया जा सकने वाला मेरा अटूट भरोसा था, एक गहरी आत्मीयता और सौम्यता भरी मुस्कुराहट थी, एक संत जैसी वाणी थी, जो मेरी असंभव लगने वाली योजनाओं के समर्थन में जोर से कहती थी, 'भाईसाहब, आपने सोच लिया है, तो वह होकर ही रहेगा। चिंता मत कीजिए हम कर लेंगे।' यह मुझसे लगभग 25 साल बड़े कामरेड चौरसिया की आवाज होती थी। वे अस्सी के दशक की शुरुआत में हमारे आन्दोलन से जुड़े और उसी के होकर रह गए। शुरुआती दस-बारह सालों तक हम लोगों ने मिर्ज़ापुर और उत्तर प्रदेश के बाल मजदूरी ग्रस्त इलाकों में जोर शोर से काम किया। फिर एक दिन मैंने उनसे कहा कि चलिए कॉमरेड, अब आप दिल्ली चलिए वहाँ मुझे आपकी जरूरत है। इसे उनका पागलपन कहें या मानव मुक्ति के लिए आत्मा की गहराइयों में बसा जुनून, उन्होंने हाँ कर दी। पत्नी, बेटे, बहुएँ और छोटे-छोटे पोते-पोतियों को मिर्जापुर छोड़कर वे दिल्ली आ गए और लगभग पच्चीस साल तक हमने मिलकर काम किया। कामरेड बाल दासता के विरुद्ध आंदोलन के सबसे संघर्षशील और समर्पित योद्धा और नायक थे। उनके बगैर मेरी किसी भी व्यक्तिगत या संगठनात्मक उपलब्धि की बात करना बेमानी होगा। सबसे जोखिम भरी अनगिनत छापामार कार्रवाइयों के दौरान मेरी ढाल की तरह, आर्थिक संकटों के दिनों में आशा और प्रोत्साहन की तरह, संगठन की उठापटक में एक शीतल फुहार की तरह, नॉर्वे में नोबेल शांति पुरस्कार लेते वक्त मेरी खुशी को अपनी आँखों के आंसुओं में सहेज लेने और दशकों तक साथ निभाने वाले चौरसिया जी जैसा कोई दूसरा नहीं हो सकता। कामरेड चौरसिया, एक बात तो तय है कि आप जहाँ भी रहेंगे, महानता आपका पीछा नहीं छोड़ेगी! और उसकी सुगंध, संगीत और रोशनी का फ़ायदा दुनिया को मिलता ही रहेगा। आपने केवल अपना शरीर छोड़ा और हम भी उसे चिता पर छोड़ आए, लेकिन न तो आप कभी मरेंगे, और न ही हम आपको मरने देंगे। आपका व्यक्तित्व और कृतित्व अमर है, और अमर ही रहेगा।

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